भोपाल गैस तबाही

आखिर कौन है इस घटना का जिम्मेवार?

3 दिसंबर 1984 रात के समय मे वहाँ मौजूद मजदूरों को सास लेने मे तकलीफ होने लगती है| यूनियन कार्बइड नाम की कारखाने (factory) मे सेवीन नाम का कीटनाशक बनाया जा रहा था| सेवीन का इस्तेमाल खेतो मे किट-पतंगो को मारने के लिये किया जाता था लेकिन इस मे एक बहुत ख़तरनाक द्रब्य (liquid) का इस्तेमाल किया जा रहा था| 3 दिसंबर की रात मे जानलेबा द्रब्य MIC (methyl isocyanide) गैस पानी के साथ रिएक्शन कर जाती है जिसके कारण बहुत बड़ा धमाका होता है|भोपाल मे हजारों के तादाद मे लोग मारे जाते है|इस घटना को दुनिया का सबसे बड़ा औद्योगिक घटना माना जाता है | क्युकी आज भी भोपाल की जनता इस ख़तनाक घटना के कारण जूझ रही है|

यूनियन कार्बइड कंपनी करीब 100 साल से भी जादा पुरानी है|इस कंपनी के कई जाने-माने चीजे काफी मशहूर है जैसे एवेरेडी बैटरी साथ ही ये रॉकेट ईंधन भी बनाती है|दुनिया भर मे यूनियन कार्बइड के कई कारखाने फैले हुए है| 1994 मे इस कंपनी का नाम यूनियन सेरोइड से बदल कर एवेरेडी इंडस्ट्री कर दिया गया था| 1969 में एवेरेडी इंडस्ट्री ने भोपाल में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट खोला खास इनसेड़ीसाइड सेवीन को बनाने के लिये|इस इनसेडिसाइड को बनाने के लिये जनलेवा केमिकल MIC का इस्तेमाल किया जाता था जो की बाहरी देशो से लाया जाता था | 1980 के दौरान UCIL को काफी बड़ा नुक्सान का सामना करना पड़ा जिसके कारण कंपनी MIC को भोपाल के कारखाने में बनाना शुरू कर देती है | MIC को बनाने के लिये सरकार भी कंपनी को इज़ाजत दे देती है साथ ही कंपनी को एवोकेशन प्लान बनाने के लिये भी कहा जाता है जिससे भोपाल में रहने वाले लोगो को जानकारी हो की यदि कभी किसी कारणबस गैस लीक कर जाये तो उसका सामना कैसे किया जायेगा | कंपनी ने कभी भी जनता के सामने एवोकेशन प्लान को प्रस्तुत नहीं किया नाही सरकार ने दुबारा इसपे ध्यान दिया |

1981 के दौरान ही जब कंपनी नुकसान से जूझ रही थी तभी MIC के कारण एक मजदूर की जान चली जाती है लेकिन इसपे भी कोई करवाई नहीं की जाती है | नुकसान के कारण कंपनी जरुरी चीज़ो से ध्यान हटा कर कटौती करने लगती है | ये आने वाले खतरे का पहला और काफी बड़ा संकेत था |

इन सभी घटनाओ के बीच बदलते परिस्थिति को देखते हुए राजकुमार केशवाणी नाम के पत्रकार ने इसके पीछे पूरी जांच पड़ताल की जिसने उन्हें ये पता चलता है की UCIL में फोसजन नाम के गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है | ये वही गैस है जिसका इस्तेमाल जर्मनी में वर्ल्ड वॉर 2 के दौरान किया जा रहा था | इसके बाद राजकुमार केशवानी ने कई रिपोर्ट तैयार किया जैसे “नाम समझो गे तो आखिर मिट ही जाओगे ” और “बचाइये हुजूर इस शहर को बचाइये ” साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री से लेकर उच्च न्यायालय तक को अर्जी लिखी जिसपे की कोई ध्यान नहीं दिया गया | जिसे खतरे का दूसरा संकेत भी कहा जा सकता है |

घटना के बाद कोर्ट में पेसी

1985 में सांसद अर्जी दी गयी जिसके कारण भारत की सरकार को अधिकार मिलता है की कोर्ट में भोपाल के लोगो पेश कर सकते है |इसके बाद कानूनी तौर पर करवाई शुरू की जाती है जो की आज भी चल रही है |आखिर कौन है इस हादसे के पीछे का जिम्मेदार? जांच पड़ताल के लिये भारत की सरकार और UCIL अपनी-अपनी जांच शुरू करते है जिसमे दोनों पकछ एक दूसरे को दोषी ठहराते है | 1984 में कारवाई ख़तम हो जाती है जब UCIL कंपनी 800 करोड़ रूपये जुर्माना के तौर पे देने के लिये तैयार हो जाती है | माध्य प्रदेश की जनता इस फैसले से संतुष्ट नहीं रहती है |1989 me इसरो के चेयरमैन सतीश धवन प्रोटेस्ट करने के लिये पिटीशन फ़ाइल करते है जिसके बाद ये केस फिर से खुल जाता है |जिसके कारण यूनियन कार्बइड कंपनी और वारेन अंद्रेन को दोषी करार किया जाता है | केस के दौरान ही 2014 में वारेन की मृत्यु हो जाती है | यूनियन कार्बइड के खिलाफ आज भी क्रिमिनल केस चल रहा है | हादसे के शिकार हुए लोग आज भी जूझ रहे है |

नये कानूनी औद्योगिक नियम

इस हादसे को देखते हुए सरकार ने कई नये नियम लागू किये जैसे पर्यावरण संरछन नियम ( enviroment protection act ) इस क़ानून के अनुसार कंपनी वातावरण को सुरछित रखने के लिये खुद से कदम उठा सकती है | कारखाना नियम (factory act ) जिसके अनुसार कंपनी को चलाने के लिए किसी जिम्मेवार व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाये |